मंगळवार, २१ जुलै, २०२०

५४ नवनिर्माण

                                          ५४  नवनिर्माण 

        भारताच्या भूतकालात जेव्हा आम्ही डोकावतो तेव्हा या देशाची विलक्षण सृजनशक्ती व जीवनातील आनंदाची असीम शक्ती आम्हाला आकर्षित करते. नवनिर्माण चालूच आहे, चालू राहणार आहे. त्याला तृप्तता ठाऊक नाही, थकावट ठाऊक नाही.
                                                                                    - महर्षी अरविंद
     कृत्रिम व परकी विचारधारांबद्दल अर्थशून्य चर्चा करून व त्यांच्या कार्यपद्धतीचे सहसही अनुकरण करून राष्ट्राचे नवनिर्माण होत नाही. त्यासाठी जनजीवनाशी प्रत्यक्ष संपर्क प्रस्थापित करून, प्रदीर्घ ऐतिहासिक प्रक्रियेतून निर्माण झालेली देशाची प्रकृती व स्थिती याचा सूक्ष्म अभ्यास करून, व्यक्तिगत व सामुदायिक व्यवहाराचे क्षेत्रात बहुविध व प्रदीर्घ प्रयोग करूनच पुढे जाणे अनिवार्य आहे. प्रत्यक्ष व्यवहाराच्या भट्टीत तापूनच नवनिर्माणाचा साचा तयार होऊ शकतो.

       हमें धर्मराज्य, लोकतंत्र, सामाजिक समानता और आर्थिक विकेंद्रीकरण को आपणा लक्ष्य बनाना होगा | इन सबका सम्मिलित निष्कर्ष ही हमें ऐसा जीवन-दर्शन उपलब्ध करा सकेगा, जो आज के समस्त झंजावात में हमें सुरक्षा प्रदान कर सके | आप इसे किसी भी नाम से पुकारे -हिंदुत्ववाद, मानवतावाद अथवा अन्य कोई नया वाद, किंतु यही एकमेव मार्ग भारत की आत्मा के अनुरूप होगा और जनता में नवीन उत्साह संचारित कर सकेगा | संभव है, विभ्रांति के चौराहे पर खडे विश्व के लिए भी यह मार्गदर्शक का काम कर सके |                                             पं. दीनदयाळ उपाध्याय

        नव्या आदर्शाना अनुरूप अशी जीवनरचना करावयाची असेल तर पारंपरिक (रूढींचा, समजुतींचा) परित्याग करावयास हवा. पश्चिमी राष्ट्रे रूढी सोडून नवनवीन संशोधनात मग्न झाली म्हणूनच ते आपली उन्नती करू शकली. परंतु आपण तर अकल्पिताच्या भयापोटी सदैव असतो. बाहेर पडण्यापेक्षा घरातच पडून राहणे प्रसंत करतो. त्यामुळे आपणात साहसी वृत्तीचा (spirit of adventure ) अभाव आहे. परंतु ही साहसी वृत्तीच कोणत्याही राष्ट्रीय समाजाच्या उन्नतीचा आधार असते.                                                                                                           नेताजी सुभाषचंद्र बोस

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