बुधवार, २२ जुलै, २०२०

६२ विजय

                                       ६२  विजय 

         आपले कार्य श्रेष्ठ आहे, महान आहे, ईश्वरी आहे. म्हणून उठा आणि नेटाने कामाला लागा.
 सत्य आपल्या बाजूला आहे. अन्याय सहन करीत झोपून राहणे हे पाप होय. 
त्यासाठी भारतमातेचे ध्यान करून तिच्या प्रेमाने प्रेरित होऊन उठा आणि कार्यविस्तार करा.
 विजय निश्चित आहे. कारण जिथे धर्म असतो तेथे भगवंत असतात. आणि जेथे भगवंत असतात तेथे विजय असतोच.                                         - श्रीगुरुजी

        हमारा निश्चय यह है कि, अपनी धरोहर को हम केवल संभालेगे ही नहीं, वरन् जो कुछ नवीन होगा उसे भी शनै: शनै: आत्मसात् करेंगे | हमने कितना बचा लिया - यह प्रश्न नहीं,  प्रत्युत हमने जीत कर कितना जोड लिया है | हमारी दृष्टि नव- दिग्विजय की है | हम मुमूर्ष अथवा जिजीविषु मात्र न होकर विजिगिषु हैं | अब खोने की बात न करें, अब अटक पार जाकर अपने झंडे गाडने, दुसरों के क्षेत्र में घुसकर सीमोल्लंघन कर विजयादशमी संपन्न करने का हमने निश्चय किया है | अब शरणागती का विचार स्वप्न में भी नहीं, समर आरंभ हो चुका है, खम ठोक कर हम खडे हैं, धनुष्य की प्रत्यंचा चढ चुकी है, अब वापसी कैसी ? अब तो विजय कितनी ही दूर क्यों न हो, उसकी प्राप्ती के बिना हमें विश्राम कहाॅं |.                                                                                             भगिनी निवेदिता

                                      

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