गुरुवार, ११ डिसेंबर, २०२५

१६४ यज्ञचक्र

                                                                           १६४ यज्ञचक्र 

        व्यष्टी, समष्टी, सृष्टी व परमेष्टी ही आपल्यासमोर चारही तत्वे परस्पर सहकार्यानेच सुखदायी होतात. व्यक्ती समाजावर अवलंबून आहे तर समाज सृष्टीवर अवलंबून आहे. आणि साऱ्या सृष्टीचे संचालन परमेश्वर करतो. परमेश्वराची इच्छा पूर्ण करण्याचे साधन बनण्यातच व्यक्तीला धन्यता वाटते. या सर्वांमध्ये जोपर्यंत काही ताळमेळ आहे तोपर्यंत सर्व काही ठीक चालते. यालाच ' यज्ञचक्र ' असे म्हटले आहे.                                          पं . दीनदयाळ उपाध्याय


१६३ स्वराज्य

                                                                    १६३ स्वराज्य 

         ' स्वराज्य 'या संकल्पनेत ३ गोष्टी प्रमुखपणाने येतात. पहिली गोष्ट ही की, जे या राष्ट्राचे घटक आहेत त्यांनी हे राज्य चालवावयाचे आहे. दुसरी गोष्ट म्हणजे राष्ट्राच्या हिताप्रमाणेच राज्य चालले पाहिजे. अर्थात राष्ट्रीय हिताच्या नितीनुसार राज्य चालले पाहिजे. आणि तिसरी गोष्ट म्हणजे राज्यामध्ये राष्ट्रहित साधण्याचे आपले स्वतःचे सामर्थ्य असले पाहिजे. म्हणजेच स्वावलंबनाशिवाय स्वराज्याची कल्पना करणे निखालस चूक आहे.             दीनदयाळ उपाध्याय

१६२ त्याग

                                                                          १६२ त्याग 

       मुख्य बात है त्याग की, बिना त्याग के कोई भी अपना संपूर्ण अंत:करण उंडेलकर अन्यों के लिए कार्य नही कर सकता | त्यागी व्यक्ती सबको समान दृष्टी से देखता है और सब की सेवा में अपने आपको लगाता है | कोई भी बाधा सत्य, प्रेम और प्रामाणिकता को नही रोक सकती | क्या तुम प्रामाणिक और मृत्युपर्यंत निस्वार्थी हो ? तब डरो मत, मृत्यू से भी नहीं |                                                                                                     स्वामी विवेकानंद

बुधवार, १० डिसेंबर, २०२५

१६० पाचनशक्ती

                                                               १६० पाचनशक्ती

         दुसऱ्याच आत्मसात करण्यासाठी प्रतिभाशक्ती आवश्यक असते. इतरांच्यात प्रवेश करण्याची शक्ती आणि त्यांना पूर्णतः आत्मसात करून टाकण्याची जादू हीच त्या प्रतिभाशक्तीची वैशिष्ट्ये आहेत. अशा प्रतिभाशक्तीचे दर्शन भारतात घडते. भारतवर्षाने नि:संकोचपणे इतरांत प्रवेश केला आणि सहजपणे त्यांच्या कितीतरी गोष्टी आत्मसात केल्या. विदेशी लोक ज्याला ' पांतलिकता ' (मूर्ती पूजा) संबोधतात त्याला पाहून भारतवर्ष कधी भयभीत झाला नाही. किंवा त्याने आपले नाक मुरडले नाही. ( तोंडही वाकडे केले नाही-नापसंती व्यक्त केली नाही) भारताने पुलिद, शब्बीर, व्याध इत्यादीकांकडून काही हीन गोष्टींचा स्वीकार करून त्यांत आपल्या भावनांची भर घातली व त्यांचेमध्ये आपली आध्यात्मिकता प्रकट केली. भारतवर्षाने कुणालाही दूर लोटले नाही, सर्वांना जवळ घेऊन आत्मसात करून टाकले.                                                                                  रवींद्रनाथ ठाकूर

मंगळवार, ९ डिसेंबर, २०२५

१५९ तरुण

                                                                               १५९ तरुण 

        ध्येयवादी प्रतिभावंतांच्या कल्पनांना मूर्त रूप देण्यासाठी जेव्हा तरुण पुढे येतील तेव्हाच राष्ट्राचा अभ्युदय होईल. राष्ट्राचे जीवन उसळत्या रक्ताने सळसळणाऱ्या तरुणांवरच अवलंबून असते. क्षात्रवृत्तीशिवाय राष्ट्र जिवंत राहूच शकत नाही. जो स्वतःचे संरक्षण करू शकत नाही तो मनुष्यच नव्हे, निव्वळ भित्रा. अशा भित्रेपणापासून मुक्त राहून जो पौरुषाचा अंगीकार करील त्या व्यक्तीस अथवा त्या राष्ट्रास जगात प्रतिष्ठा प्राप्त होईल.


          भीषण संकटांचे आव्हान स्वीकारण्यातच ज्यांना मनस्वी आनंद वाटतो. त्यांच्या स्नायूंमध्ये तारुण्य सुलभ सामर्थ्य असते, डोळ्यात आदर्शाचे तेज असते; प्रतिकूल परिस्थिती आणि प्रलोभनांच्या वादळातही ते सागरासारखे गंभीर निश्चल राहू शकतात, असे तरुणच विजयामागून विजय संपादन करीत आपले अंतिम ध्येय साध्य करतात.                                                                                                                                       प. पू.  श्रीगुरुजी

१५८ जातीयता

                                                                       १५८  जातीयता 


       आपले नेतृत्व प्रस्थापित करण्यासाठी राजकीय पुढारीच जातीयवाद व सांप्रदायिक भेदभावांना भडकावीत असतात. अशा या राजकीय पुढाऱ्यांपैकी बहुतेक जण जातीयवादाचा पुरेपूर फायदा उठवितात. परंतु जेव्हा-केव्हा ते हिंदू समाजातील दोषांवर विशेषतः जातीव्यवस्थेवर बोलत असतात तेव्हा त्यांची जीभ मोकाट सुटते. व्यासपीठावरून ज्या जातीयवादाविरुद्ध जहरी टीकाटिप्पणी करीत असतात त्याच जातीयवादाचा आधार आपले पुढारी पण पक्के करण्यासाठी पडद्याआड घेत असतात. निवडणुकी समई जातीयतेचा विचार करून उमेदवार निवडतात.

१५७ साम्यवाद

                                                                              १५७ साम्यवाद 


           भौतिक दृष्टिकोनातून निर्माण झालेल्या लोकशाहीवादी शक्तीनी खरे बोलायचे तर लोकशाही सत्तेच्या आड दडून बहुसंख्य सामान्य जणांचे शोषण करणाऱ्या मूठभर पुंजीपती सत्ताधाऱ्यांनी सामान्य जनांना जगणे अशक्य करून टाकले. या सत्ताधाऱ्यांपासून मुक्ती मिळविण्यासाठी ज्या साम्यवादाचा विचार केला गेला तो सुद्धा भौतिकवादातूनच पुढे आला असल्यामुळे पशुतेच्या तांडवनृत्यालाच कारण झाला. विरोध विकास वाद हे समाजजीवनाच्या प्रगतीसाठी आवश्यक असे मानून अकारण भयानक रक्तपात, संहार व प्रलय यालाच कर्तव्य मानले. स्वर्गप्राप्तीची आशा दाखवून इस्लामने ज्याप्रमाणे शेकडो वर्षे हत्या मारपीट करून, पृथ्वीवर रक्ताच्या नद्या वाहविल्या त्याचप्रमाणे राज्यविरहित समाज निर्मितीच्या खोट्या आशावादाने कम्युनिस्ट पुन्हा एकदा संपूर्ण जगाला मानवी हत्याकांडाच्या खाईत ढकलण्यास कटिबद्ध आहेत.                                     बाळशास्त्री हरदास

         साम्यवाद आणि समाजवाद ही प्रगती नव्हे; प्रतिगती (पीछेहाट) आहे. यांच्यामुळे मानवाची पीछेहाट होते आहे. मानवी विकासक्रमाचा थोडा जरी अभ्यास केला तरी ही गोष्ट सहज लक्षात येते. मनुष्य आपल्या प्राथमिक अवस्थेत जडतत्त्वाचा विचार करतो आणि त्यातच रमून जातो. नंतर त्यास कंटाळतो, तेव्हा तो मानसिक पातळीवर पोहोचतो. विविध प्रकारच्या मानसिक प्रयत्नांनी तो आपले लक्ष विभाजित करतो. तदनंतर तो नाना प्रकारे बौद्धिक प्रगती करतो आणि तत्पश्चात सर्वांच्या पलीकडे जाऊन बुद्धीला अगम्य अशा परमात्म्याचा विचार करू लागतो. हीच त्याची खरी प्रगती असते.                                                                                प . पू. श्रीगुरुजी

सोमवार, ८ डिसेंबर, २०२५

१६१ संस्कृती

                                                                    १६१ संस्कृती

       पश्चिमेत उदयास आलेल्या राजनीतीप्रधान कार्यपद्धतीत विशेष करून कम्युनिस्ट कार्यपद्धतीत राजसत्तेलाच परिवर्तनाचे एकमेव साधन मानले जाते. व म्हणूनच सत्ताप्राप्ती हेच साम्यवादी पक्षाचे एकमेव ध्येय असते. त्यासाठी साहित्यिक, श्रमिक व विद्यार्थ्यांचे त्यांच्या अधिपत्याखाली मंच निर्माण केले जातात. संस्कृतीला केंद्रबिंदू मानून राजकारण हे राष्ट्रजीवनाचे केवळ एक अंग आहे असे मानले जाऊ शकते व संस्कृतीच्या प्रकाशात जीवनाचे प्रत्येक क्षेत्रात राष्ट्रीय पुनर्निमाणाच्या दिशेने, रचनात्मक प्रयोग केले जाऊ शकतात. हे साम्यवादी बुद्धिमंत्तांना समजणे सुद्धा कठीण आहे.

१५६ समर्पण

                                                                १५६ समर्पण 

          कधी कधी स्वयंसेवकांच्या मनात काही दान करावे असा विचार येतो. पण दान करणारा तो कोण ? एकदा स्वयंसेवक झाला म्हणजे तो स्वतःच संघाचा होत असतो. मग त्याच्या जवळ दान करण्यासाठी उरतेच काय ? आणि मग पैसे देऊन स्वयंसेवकांची आपल्या कर्तव्यातून सुटका होत नाही. कारण ' काया, वाचा किंवा मनाने ' असे आपण प्रतिज्ञेत म्हटलेले नाही तर तेथे तन-मन-धनाचा एकत्रित उल्लेख आहे. आपली सर्व ऐच्छिक सुख संपत्ती संघ कार्यासाठी देईन अशीच भावना या एकत्रित उल्लेखात आहे. यालाच म्हणायचे समर्पण.                                    - पू . श्रीगुरुजी  

१५५ देशभक्ती

                                                          १५५  देशभक्ती 

         ईसाई, मुसलमान  व हिंदू हे सर्व एकत्र रहावेत असे केवळ हिंदूच म्हणतात. ख्रिस्ती वा मुसलमान म्हणत नाहीत. आमचा कोणत्याही उपासनापद्धतीशी विरोध नाही. परंतु राष्ट्राच्या विरोधात जो उभा राहील तो जरी मुलगा असला तरी त्याच्याबरोबर आमचा व्यवहार कठोर राहील. अहिल्याबाई, शिवाजी महाराजांचा आदर्श व्यवहार आमच्या समोर आहे. जर कोणी राष्ट्रविरोधी, अन्य मतावलंबी झाला तर त्याच्या बरोबरचा आमचा व्यवहार अहिल्याबाई वा छत्रपती शिवाजी महाराजांसारखा राहील, असे म्हणण्याची टाळाटाळ कोणी करू नये. 

रविवार, ७ डिसेंबर, २०२५

१५४ पंथ

                                                              १५४  पंथ 

        रिलिजन की मतांध कल्पना तथा राज्यसत्ता पादरीयों के हात में होने के कारण पाश्चात्य देशों ने बहुत सदियों तक कष्ट भोगे हैं | उक्त कल्पना से धर्म की हमारी कल्पना प्रकाश और अंधकार के समान भिन्न है | धर्म अथवा आध्यात्मिकता कोई अंधमत नही है अपितु संपूर्ण जीवन का एक दृष्टिकोन है | राजनीतिक अथवा आर्थिक क्षेत्रों के समान राष्ट्रजीवन का कोई अलग क्षेत्र नहीं है | आध्यात्मिकता हमारे दृष्टी में जीवन की एक व्यापक दृष्टी है, जिसे सामाजिक जीवन के सभी क्षेत्रों को अनुप्राणित और उन्नत कर उनके बीच समन्वय की स्थापना करनी चाहिये |                                                                                                                     श्री गुरुजी

            धर्मनिरपेक्षतेच्या चुकीच्या व्याख्येने आम्ही आपल्या नवयुवकांच्या पिढीला आपल्या गतकाळापासून वंचित केले असून भविष्याविषयी काहीच मार्गदर्शन केलेले नाही. ज्या कार्यास ते हातभार लावू शकतील अशी नवीन विश्वाची कसलीच कल्पना आम्ही त्यांच्यासमोर उभी केलेली नाही. अशा लोकांना अथवा मानव जातीलाही देता येईल असा काही संदेश आपणास जवळ नाही.                                                                           संपूर्णानंद

१५३ विश्वसंचार

                                                                               १५३  विश्वसंचार  

           नद्या, पर्वत आणि सागर यांना उल्लंघून देश काळाच्या अडथळ्यांना जणू नगण्य ठरवून भारतीय चिंतनाचे रक्त पृथ्वीवर राहणाऱ्या अन्य वंशाच्या धमन्यांमध्ये कित्येक ज्ञात, अज्ञात, स्पष्ट, अनिर्वचनीय मार्गांनी आतापर्यंत वाहत आले आहे व आज देखील वाहत आहे. बहुधा, जगाच्या प्राचीन ज्ञानभांडारात आपला सिंहाचा वाटा आहे.                                                                                                                                       स्वामी विवेकानंद

शनिवार, ६ डिसेंबर, २०२५

१५२ संन्याशी

                                               १५२    संन्याशी 

       लोकमत परिष्कार का कार्य वही कर सकता है, जो लोकेषणाओं से ऊपर उठ चुका हो | भारत ने इसका समाधान खोज निकाला है | भारत ने इसका समाधान राज्य के हाथ से लोकमत निर्माण के साधन छीनकर किया है | लोकमत परिष्कार का कार्य है -  वीतरागी द्वंद्वातीत संन्यासियों का | लोकमत के अनुसार चलने का काम है - राज्य का | संन्यासी सदैव धर्म के तत्वों के अनुसार जनता के ऐहिक एवं आध्यात्मिक समुत्कर्ष की कामना लेकर अपने वचनों एवं निरीह आचरण से जनजीवन के ऊपर संस्कार डालते रहते हैं, उन्हे धर्म की मर्यादाओं का ज्ञान करते रहते हैं | कोई लोभ और मोह न होने के कारण वे सत्य के उच्चारण सहज कर सकते हैं |  लोकशिक्षा और लोक संस्कार के वही केंद्र हैं | शिक्षा और संस्कार से ही समाज के जीवनमूल्य बनते और सुदृढ होते हैं | इन मूल्यों को बांध रखने के बाद लोकेच्छा की नदी कभी अपने चटों को अतिक्रमण कर संकट का कारण नहीं बनेगी |                                पं. दीनदयाळ उपाध्याय

शुक्रवार, ५ डिसेंबर, २०२५

१५१ साधना

                                                                १५१   साधना 

१ 

           मानवी जीवन रूपांतरीत करणे हाच साधनेचा अर्थ आहे. जीवनाच्या रूपांतरासाठी केवळ बाह्य परिवर्तनाने भागणारे नाही. त्यासाठी मानवी जीवन नवीन आदर्शांच्या आधारावर अनुप्राणीत केले पाहिजे. त्या आदर्शाचे अनुसरण करताना आपणास आहुती दिली पाहिजे. आदर्शाच्या बलिवेदीवर स्वतःच बळी दिल्यानंतर माणसाचे विचार, उक्ती आणि कृती यात एकसूत्रता येते. त्याचे अंतर्बाह्य रूप एक होते. संपूर्ण जीवन एका आदर्श सूत्रात गुंफले जाते. या क्षणी तो जीवनाचा नवीन रस, नवीन अर्थ, नवीन आनंद शोधू शकतो. त्याच्यासमोर समग्र विश्व नव्या प्रकाशात प्रकट होते.                                                                                                                                                नेताजी सुभाष



गुरुवार, ४ डिसेंबर, २०२५

१५० एकरस राष्ट्रजीवन

                                                                         १५०    एकरस राष्ट्रजीवन 

        आज आपल्याला प्रत्येक मनुष्याच्या अंत:करणात अशी अनुभूती निर्माण करावयाची आहे की, काश्मीरपासून कन्याकुमारीपर्यंत भिन्न भिन्न विचार प्रवाह संप्रदाय पंथोपपंथ जाती उपजाती आणि विविध भाषाभाषी असे आपण सर्व मिळून हा एक अखंड समाज आहे, आपले हे अखंड राष्ट्र आहे व आपले सर्वांचे मिळून एकरस राष्ट्र जीवन आहे. अशा प्रकारच्या सहानुभूतीने प्रत्येकाचे जीवन परिपूर्ण करण्यासाठी आपण प्रयत्नशील असले पाहिजे.

सोमवार, १५ सप्टेंबर, २०२५

१४९ आक्रमण

                                                               १४९  आक्रमण 

     आपल्या देशावर तीन दिशांनी आक्रमण चालू आहे. पेट्रोडॉलर्सच्या मदतीने इस्लाम प्रचार अतिवेगाने वाढत आहे. हजारो इसाई पादरी आपल्या हिंदुसमाजाचे लचके तोडून इसाईंची जनसंख्या वाढवीत आहेत. त्यांना सुद्धा कोट्यावधी रुपयांची मदत परदेशातून मिळत आहे. रशियाचे आक्रमण पद्धतशीरपणे चालू आहे. प्रथम साम्यवादी साहित्य पाठविणे, साम्यवादाचा प्रचार करणे व आपल्या विचाराने भारलेले, आपल्या तालावर नाचतील असे काही लोक उभे करणे, त्यांच्यातीलच एखाद्याकरवी आमंत्रण मिळविणे व त्यानुसार सैन्य घेऊन त्या देशाचे उरावर बसणे आणि आम्ही हल्ला थोडाच केला आहे, आम्ही तर देशात शांतता प्रस्थापित करण्यासाठी आलेलो आहोत असा कांगावा करणे हीच तर त्यांची रीत आहे.

रविवार, १४ सप्टेंबर, २०२५

१४८ बहुसंख्य

                                                                 १४८   बहुसंख्य 

१ 

        गांधारांनी दीडशे वर्षे आक्रमणाशी उग्र संघर्ष केला. परंतु अखेर त्यांना पराभव पत्करावा लागला. इतिहासाचे म्हणणे असे आहे की इस्लामचा प्रसार त्यांच्या श्रेष्ठ तत्वज्ञानामुळे झाला नसून तलवारीच्या बळावरच लोकांना धर्मांतरित करूनच झाला. अशा प्रकारे गांधाराचे बळजबरीने धर्मांतर केल्यानंतरच गांधाराचे अफगाणिस्थान झाले. १९४७ मध्ये अर्धा पंजाब, सिंध, बलुचिस्तान व अर्धा बंगाल आपल्यापासून तुटून अलग झाले. काय कारण ? त्याचे एकच कारण आहे. ज्या ज्या भागात हिंदू अल्पसंख्याक झाले तो तो भाग हिंदुस्थानापासून तुटला.

१४७ देशद्रोह

                                        १४७    देशद्रोह 

       गेल्या हजार वर्षांचे आपले जीवन अत्यंत खडतर, कष्टमय आहे. या काळात मूठभर तुर्क पठाण व मोंगलानी आपला देश पादाक्रांत करून आम्हाला गुलाम केले. हा दोष कोणाचा ? मुगल, पठाण व इंग्रजांचा का ? नाही, सुतराम नाही ! हा आमचाच दोष होय. आपल्या हिंदू समाजाचाच दोष होय. गेल्या हजार वर्षांत देशात स्वार्थ भावना प्रबल होत गेली. आपले कुटुंब, आपले दुकान, आपला मानसन्मान या भावनेतच आपण गुरफटून गेलो. आम्ही व्यक्तिगत व पारिवारिक स्वार्थापायी राष्ट्रघात करण्यासही कमी केले नाही. देशद्रोहही केला. इतकेच नव्हे तर आपल्याच लोकांनी स्वार्थ व परस्पर द्वेषापायी परकीयांना सहाय्य केले.

         जिस प्रकार पहिया तभी घूम सकता है जब उसकी धुरा पहिले के अंदर हो बाहर नहीं, और अपने से बाहर केंद्र वाले वृत्त का तो अस्तित्वही असंभव है | उसी प्रकार भारतीय जीवन भी यदि उसके जीवन का केंद्र भारत से बाहर रहा तो नष्ट-भ्रष्ट हुए बिना ना रहेगा |                                                                                     श्रीगुरुजी


१४६ राष्ट्रीय स्वाभिमान

                                                     १४६   राष्ट्रीय स्वाभिमान 

        राष्ट्रीय स्वाभिमान ही कोणत्याही स्वतंत्र देशाच्या दृष्टीने कमी महत्त्वाची गोष्ट नसते. या स्वाभिमानातच एक आत्मीयता दडलेली असते. या आदमी आत्मियतेतच कार्याच्या प्रेरणाचे तत्व सुप्तपणे अस्तित्वात असते. त्यालाच अहं म्हणतात. ही ' अहम् ' भावनाच राष्ट्रघटकांना नवनिर्माणाची आणि नवनवीन अविष्कारांची प्रेरणा देते. या आधारावरच स्वतंत्र राष्ट्रे कठीण प्रसंगात असे काही साहसी निर्णय घेण्यात यशस्वी होतात की त्यांची गणना ' ऐतिहासिक ' निर्णय म्हणून केली जाते. म्हणूनच हे निश्चित समजले पाहिजे की विदेशी विचारप्रवाह व ' वाद ' यांचे ओझे ओढत राहणे राष्ट्रीय स्वाभिमानास शोभणारी गोष्ट नाही.                                                                    पं. दीनदयाळ उपाध्याय      

१४५ समर्पित जीवन

                                                                  १४५  समर्पित जीवन

      आजकालच्या राजकीय वातावरणात चटकन् लोकप्रिय होण्याच्या लालसेने त्याग करणे शहाणपणाचे समजले जाते. परंतु हे हितकारक होईल का? हे आपले हिंदुराष्ट्र आहे हे ऐतिहासिक अनुभव सत्य नाकारले तर राष्ट्रासाठी त्याग बलिदान परिश्रम करण्याची व विजयाची इच्छा आकांक्षा शिल्लक राहील का? आज सुद्धा आपल्या व्यक्तिगत जीवनात सुख आशा आकांक्षांचा त्याग करून जे लोक निश्चयपूर्वक राष्ट्रसेवा करीत आहेत त्यांच्या अंतःकरणातील ' हे आमचे हिंदू राष्ट्र आहे ' व त्याला या विषयांमध्ये सार्वभौम संपन्न व सुखी करू ही प्रेरणा एकमेव कारण आहे. या प्रेरणेचा त्याग केला तर समर्पित जीवनाची परंपरा समाप्त होईल.

१४४ राष्ट्र

                                                             १४४    राष्ट्र

      हिंदू समाजाचे सुख हेच माझे व माझ्या कुटुंबाचे सुख. हिंदुसमाजावरील संकट म्हणजे आपणा सर्वांवरील संकट आणि हिंदू समाजाचा अपमान म्हणजे सर्वांचा अपमान अशी आपलेपणाची भावना हिंदूमात्राच्या रोमा रोमात भिनली पाहिजे. हाच राष्ट्रधर्माचा मूलमंत्र होय.

      राष्ट्र म्हणजे परस्पर विरोधी परंपरा, संस्कृती व भावना असलेल्या लोकांचे ओढून ताणून आणून बांधलेले गाठोडे नव्हे, तर धर्म, संस्कृती, देश, भाषा आणि इतिहास यातील साधर्म्यामुळे ' आम्ही सर्व एक आहोत ' याची जाणीव होऊन आम्ही सर्व एक राहू असा निश्चय केल्याने जी एक अपूर्व आत्मियता आणि तन्मयता निर्माण होते तेच राष्ट्राचे अधिष्ठान  आहे.                              प. पू. डॉ. हेडगेवार

         आजच्या तरुण पिढीला समाज जगला तरच मी जगू शकेन, असे वाटतच नाही. आपण कुटुंबनिष्ठेच्या रोगाने पछाडलेलो आहोत. ज्यांच्या मनात व्यक्तिगत स्वार्थाला यत्किंचितही स्थान नाही असे खरे देशभक्त किती असतील ? फारच थोडे. हिंदु राष्ट्राचा विचार करताना एका व्यक्तीचा विचार मनातून काढून टाका. मी आणि राष्ट्र एकच, अशा विचाराने तन्मय होतो तोच खरा राष्ट्र सेवक होय.                                                                                               प . पू. डॉ. हेडगेवार

           हमारी प्राचीन राष्ट्रव्यवस्था का एक अनोखा पक्ष यह था कि उसमें संपत्ती के उत्पादन को राजनितिक सत्ता से अलग रखने की सावधानी बरती थी | इन दोनो शक्तियों का एकही व्यक्ती अथवा एकही वर्ग के हातों केंद्रित हो जाना या तो समाज का पतन करके उसका दास बनाता है, अथवा कष्टों के असह्य हो जाने पर लोगों को विद्रोह करने के लिए उद्दीप्त करता है | ऐसी स्थिती में सामाजिक स्थिरता, प्रगति येवं संपन्नता का अभाव हो जाना अपरिहार्य है |                         श्रीगुरुजी



शनिवार, १३ सप्टेंबर, २०२५

१४३ मोक्ष

                                            १४३   मोक्ष

      अमार्याद उपभोगाची लालसा आणि तिच्या तृप्तीसाठी स्पर्धेची शर्यत यामुळे सुख मिळत नाही. त्यासाठी आपल्या जीवनात संयम असण्याची आवश्यकता आहे. व्यक्ती म्हणून व समाज म्हणूनही संयम असणे आवश्यक आहे. त्यासाठी आपल्या येथे चार पुरुषांची कल्पना मांडली आहे. चार पुरुषांची कल्पना संयमशील जीवनासाठी आहे. व्यक्ती व समाज या दोघांच्याही दृष्टीने कर्तव्याचा विचार केला आहे. धर्माने म्हणजेच कर्तव्यभावनेने नियंत्रित राहूनच अर्थ व काम या पुरुषार्थांची आराधना करावी. त्याच वेळी मोक्षाची इच्छा सतत राहावी. यामुळेच आपल्याला आपल्या मूळ सुखमय स्वरूपाची अनुभूती येईल. ही इच्छा म्हणजेच चौथा पुरुषार्थ ' मोक्ष ' होय. नदीचे पाणी जसे दोन तटांच्या मधून वाहते तेव्हा सर्व त्या पाण्याचा उपयोग करू शकतात. ती तट फोडून वाहू लागली तर विध्वंसाचे कारण बनते. त्याचप्रमाणेच ऐहिक उपभोगाची नदीही धर्म व मोक्ष या दोन तटांच्या मधूनच वाहणे सुखकारक आहे.


गुरुवार, २० मार्च, २०२५

१४२ सातत्य

                                                                       १४२    सातत्य 

        फुटीरतेच्या अनेक भावना आपले समाज जीवन पोखरून टाकीत आहेत. फुटीरतेच्या रोगाची मुळे खूप खोलवर गेली आहेत. त्यावरील उपायही अगदी मूलगामी असला पाहिजे. म्हणूनच आपला असा आग्रह असतो की रोज नियमितपणे शाखेवर आले पाहिजे. एखादा विचार रोज नित्यनेमाने ठरल्या वेळी पुन: पुन्हा सांगितला गेला तर तो हळूहळू अंतःकरणात खोलवर बिंबत जातो व शेवटी आपल्या स्वभावाचा अविभाज्य पैलू बनतो. नियमितपणा आणि वक्तशीरपणा याचा संघात एवढ्या टोकाचा आग्रह धरण्यात येतो याचे कारण हेच आहे.


बुधवार, १२ मार्च, २०२५

१४१ परिवर्तन

                                                                       १४१  परिवर्तन 


१  

      आपण ' परम् वैभवं नेतुमेतत् स्वराष्ट्रं '  ही आकांक्षा ठेऊन चाललो आहोत. आपण समाजात परिवर्तन करू इच्छितो. ' मी माझ्यात परिवर्तन घडवून आणले आहे ' अशा प्रकारे छातीठोकपणे आमचा स्वयंसेवक सांगू शकेल अशी स्थिती उत्पन्न व्हावी याकडे लक्ष देणे आवश्यक आहे.

        आपला विशाल जनसंख्या असलेला प्राचीन समाज आहे. त्याचे प्रश्नही तसेच विशाल आहेत. त्यामुळे दुःख होणे स्वाभाविक आहे. परंतु अत्यंत परिणामकारी व लागलीच प्रभावी होणारी उपाययोजना करणे शक्य नाही. अत्यंत धीराने अधिक कार्यकर्त्यांना कार्यरत करून, त्यांच्याबरोबर अधिक हिंदू बंधूंना जोडून हे कार्य करणे आवश्यक आहे. संघाच्या माध्यमातून अनेक प्रकारचे प्रवाह समाजात उत्पन्न झाले आहेत. या प्रवाहांद्वारा समाजात परिवर्तन व्हावे असा आपला दृष्टिकोन आहे. या प्रवाहांचा वेग वाढला तर परिवर्तन लवकर होईल.                                                                                                                                                             प. पू.  बाळासाहेब देवरस    

         जितना बडा लक्ष्य, उतनीही बडी प्रेरणा और उतनाही लंबा पथ | छोटे रास्ते से बडा काम नही हो सकता | परिवर्तन बातों या बातें बनाने-बदलने से नहीं आता | परिवर्तन की पहिली  शर्त है भविष्य के प्रती पूर्ण आस्था और अपने कर्म पर भरोसा | निर्माण निहोरा देनेसे नहीं होता | निर्माण का प्रथम बिंदू है साध्य का स्पष्ट ज्ञान | साधना, विद्या और मार्ग पर विश्वास | वर्तमान को अतीत के दृष्टि से नहीं,  अतीत को आधुनिक संदर्भ प्रदान करने से ही भविष्य युगानुकुल वर्तमान बनकर धरती पर उतरता है |  

       आज मानवी जीवन एका महान परिवर्तनाच्या सीमा रेषेवर येऊन ठेपले आहे. जे संकल्प आज रुजविले जातील, जे जे प्रयोग केले जातील आणि ज्या ज्या प्रेरणा आम्ही ग्रहण करू, त्या सर्वांना एक भव्य, व्यापक आणि तेजस्वी संस्कृतीचा रूप लाभेल. परंतु यासाठी श्रद्धा हेच आपले सर्व मानणाऱ्या प्रयोगवीरांची आवश्यकता आहे; पण मनुष्य जर शुद्र वासना आणि तुच्छ आदर्शांना शरण गेला आणि जर उच्च महत्त्वकांक्षेसाठी शास्त्रीय निष्ठा आणि संन्याशाच्या निश्चिंततेने सर्वस्व समर्पण करण्यास कचरला तर ही सुसंधी अगदीच वाया जाईल. ( हा मोसम अगदीच व्यर्थ जाईल ) परंतु जर महासागराच्या भयानक वादळातही उडी टाकण्याची तर माणसाची हिंमत असेल, प्राण पणास लावण्याची त्याची तयारी असेल तर तो नि: संशय ज्याची कधी कल्पनाही केलेली नाही अशा महान संस्कृतीचा आणि अलौकिक प्रगतीचा स्वामी बनेल.                                         काका कालेलकर

        ज्या क्षेत्रातून गंगा वाहते तेथील भूभाग कधी ओसाड राहू शकत नाहीत. जमिनीस सुजला, सुफला, सस्यश्यामला बनविण्यासाठी गंगेचे पाणी अनेक कालवे, पाट यांच्या द्वारा सर्वत्र नेले जाते. अशाच प्रकारे जिथे जिथे संघगंगा वाहते आहे तेथे तेथे सभोवतीच्या हिंदू समाजात परिवर्तन झाल्याशिवाय राहत नाही. समाजाची एकता आणि प्रगती यांच्या मुळावरच घाव घालणाऱ्या गैरसमजुती, रुढी, लोकांचार यासारख्या अपप्रवृत्ती हळूहळू नष्ट होत जातात. त्यांची जागा निकोप सामाजिक व्यवहारांना संजीवनी देणाऱ्या दृष्टिकोनाने आणि निकषांनी घेतलेली असते. कोणताही सामाजिक पैलु दृष्टीआड होणार नाही अशा सामाजिक परिवर्तनाचे चित्राने प्रेरित होऊन, अग्रणी होऊन स्वयंसेवकांना प्रगतीपथावर पुढे जायचे आहे.

रविवार, २ फेब्रुवारी, २०२५

१४० सामान्य माणूस

                                       १४०  सामान्य माणूस 

         राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघाने कल्पिलेल्या वैभवाच्या रूपरेषेत सामान्य माणसालाच प्रमुख स्थान दिले गेले आहे. सामान्य माणसाच्या राष्ट्रीय व व्यक्तिगत चारित्र्याची पातळी उंचावण्यासाठी आम्ही प्रयत्नशील आहोत. सर्वसामान्य माणसाच्या जीवनात जितक्या प्रमाणात उत्कृष्ट गुण असतील तितक्या प्रमाणात देश मोठा व प्रगतिशील मानला जाईल.

        आपल्या कार्याची वृद्धी हे सर्व प्रश्नांना उत्तर होय. आपण निष्ठेने काम करीत राहिले पाहिजे. आपल्या अंतःकरणातील स्नेहभावनेचा स्पर्श, आपल्या बोलण्यातील गोडवा, यांचा लाभ झोपडी झोपडी पर्यंत पोहोचला पाहिजे. सर्वांना संघस्थानावर आणून आपल्या निरनिराळ्या कार्यक्रमातून आपण सर्व एका समाजाचे घटक आहोत ही भावना वागवून परस्पर सहकार्याने काम करण्याची प्रवृत्ती निर्माण करावी लागेल. संघ स्थानावरील हे चैतन्यमय  वातावरण आता घराघरात पोहोचले पाहिजे. प्रत्येक शाखेने त्या दृष्टीने आपली योजना करावी. वनवासी क्षेत्रात आपले कार्यकर्ते गेले आहेत. तसेच प्रत्येक शहरात दुर्लक्षित, मागासलेल्या वस्त्या आहेत. त्या वस्त्यापर्यंत आपण पोहोचले पाहिजे. आपल्या परिश्रमाने, अंत:करणातील सहानुभूतीने, अत्यंतिक स्नेहभावनाने आपण सर्वांची मने जिंकली पाहिजेत. कोणाचे मनात अविश्वास, गैरसमज, भीती असेल तर तीही आपल्या निस्वार्थ वागणुकीने दूर केली पाहिजे.

१३९ मेरी बिलबेन

                             १३९  मेरी बिलबेन - अमेरिकी गायिका, अभिनेत्री 


    दोन पवित्र भूमी मला प्रिय आहेत. पहिली आहे, पवित्र देश इस्राइल. आणि दुसरा देश आहे, भारत. सर्वांची मातृभूमी . 

शनिवार, १ फेब्रुवारी, २०२५

१३८ लहान कामे

                                    १३८  लहान कामे 

        संपूर्ण देशातील अव्यवस्था दूर करून तेथे सुव्यवस्था निर्माण करणे हेच संघाचे काम आहे. पण जे स्वतः व्यवस्थित आहेत असेच लोक हे काम करू शकतील. आणि व्यवस्थितपणासाठी आवश्यक असते व्यवस्थित मन. दुःख, राग किंवा मोह यांनी विचलित झालेले मन कसलेच काम नीट करू शकत नाही. आणि मन स्थिर करणे हे लहान कामे एकाग्रचित्त राहून करण्याच्या सवयीनेच शक्य होत असते.

        अतिशय छोट्या छोट्या गोष्टींकडेही आम्ही नीट लक्ष दिले पाहिजे. थेंबाथेंबानेच जलाशय बनत असतो. तसेच छोट्याछोट्या त्रुटींमुळेच मोठी चूक होत असते. म्हणून शाखेत ज्या ज्या गोष्टी शिकविल्या जातात त्याचा छोटा अंशही नगण्य किंवा कमी महत्त्वाचा समजून नये.                                                     प. पू.  श्रीगुरुजी

१३७ हिंदू चेतना जागृती

                                            १३७ हिंदू चेतना जागृती 


       बंगाली, सिंधी, आसामी, बौद्ध, जैन, लिंगायत ही सर्व व्यापक हिंदू अस्मितेची अंशतः प्रगत रूपे आहेत. आणि त्याचप्रमाणे शरीर प्राणहीन झाल्यावर त्याच्या विभिन्न अवयवांमध्ये हालचाल होत नाही किंवा त्यांच्यात कसलाच ताळमेळ किंवा सामंजस्य राहत नाही, त्याचप्रमाणे समाज मृतवत झाल्यावर त्याच्या विभिन्न अवयवांमध्ये काहीच ताळमेळ वा सहकार्य उरत नाही. हिंदू समाजाची सुप्त चेतना जागी करणे हेच संघाचे काम आहे.

      ' गर्व से कहो हम हिंदू है ' या घोषणेत हिंदू समाज जागृत, एकीकृत नि कार्यरत होत असल्याचे चिन्ह आहे. तिच्या ध्वनीत नि प्रतिध्वनीत हिंदुत्ववादी कार्यकर्त्यांना नि विचारवंतांना आपले मनोगत ऐकू यावे हे स्वाभाविकच. आपले ध्येय व स्वप्न, आपले तत्वज्ञान नि आपल्या इच्छा आहे त्यांना अशाच सतत ऐकू आल्या पाहिजेत. विचार असा जिवंत राहिला, गाजत राहिला तरच आचाराला योग्य दिशा मिळेल.


गुरुवार, ३० जानेवारी, २०२५

१३६ मनःशक्ती

                                                                                 १३६  मनःशक्ती

     गंभीर चिंतन करून डॉक्टरांनी असा निष्कर्ष काढला की, लोकांच्या मनस्थितीमध्ये पूर्ण क्रांती होणे हीच आजची सर्वात मोठी आवश्यकता आहे. परकीय गुलामगिरी आणि इतर दोष दूर करण्याचा रामबाण उपाय मानसिक क्रांती हाच आहे. बाह्य क्रांती नाही.                                                                 परमपूजनीय श्रीगुरुजी

सोमवार, २७ जानेवारी, २०२५

१३५ हिंदु संगठन

                                                               १३५ हिंदु संगठन 

            राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघाचे कार्य एखाद्या नगरापुरते वा प्रांतापुरते मर्यादित नाही. आपला संपूर्ण हिंदुस्थान देश अतिशीघ्र सुसंगठीत करून स्वसंरक्षणक्षम व बलसंपन्न करण्याच्या उद्देशाने त्याचा आरंभ केलेला आहे. हा समाज असंघटित व विस्कळीत राहिला तर भविष्यात त्याचे अस्तित्व सुद्धा राहणार नाही व हिंदू संस्कृतीचे नावसुद्धा राहणार नाही.

     हिंदू समाजाचे आजच्या भयानक संकटापासून रक्षण करावयाचे असेल तर एक असे देशव्यापी नैतिक आंदोलन करावे लागेल की ज्यामुळे प्रत्येकाच्या अंतःकरणात आत्मचेतना जागृत होईल. ती जागृत होताच आत्मविश्वासाने स्वतःच्या शक्ती, सामर्थ्य, बल व पराक्रमाच्या आधारावर समाजातील प्रतिक्रियाशील, विरोधी शक्तींचे निर्दालन करून आत्मसन्मान आणि आत्ममर्यादांचे रक्षण करण्यास समर्थ होईल.                             - स्वामी प्रणवानंद

       आपल्या मनात जर ही दृढ धारणा असेल की हे राष्ट्र आपले आहे, इथे आपलेच राष्ट्र जीवन आहे. हे राष्ट्रजीवन श्रेष्ठ आणि संपन्न बनविण्याची जबाबदारी आपली आहे. ती जबाबदारी पूर्ण करण्यासाठी केवळ आजच्याच गोष्टीकडे लक्ष न देता चिरंतन स्वरूपात प्रत्येक व्यक्तीच्या हृदयात राष्ट्रभावना निर्माण करण्याच्या हेतूने एक सुव्यवस्थित व राष्ट्रीय कल्पनेने प्रभावित असे कार्य उभे केले पाहिजे.

         आम्हाला आपला हा हिंदुसमाज इतका सुसंघटित आणि शक्तिशाली बनवायचा आहे की, इतर समाजाच्या मनात हिंदुंबद्दल अगदी पाहता क्षणी आदर उत्पन्न झाला पाहिजे. येथे साध्य व साधन एकरूप आहेत. संघटन हेच साध्य व संघटन हेच साधन. सुसंघटित असणे हीच प्रत्येक जिवंत समाजाची स्वाभाविक अवस्था असते. कोणत्याही परिस्थितीत आणि कोणत्याही काळात सुसंघटित असणे आवश्यकच असते. केवळ सुसंघटित समाजच आपल्या सगळ्या समस्या यशस्वी रीतीने उलगडू शकतो हे आम्ही विसरता कामा नये.

१३४ चारित्र्य

                                                       १३४  चारित्र्य 

         जिस प्रकार हमारी प्रत्येक कृति में हमारा व्यक्तित्व अभिव्यक्त होता है, उसी प्रकार इन अनेक कृतियों को मिलाकर बना हुआ हमारा जीवन हमारा चरित्र प्रकट करता है | हम जो कुछ है अपने चिंतन के परिणाम है | अभियंता कहते हैं, कि जल अपने समतलतक पहुंचता है |जो बात जल की वही मनुष्य की | मनुष्य जहां भी रहेगा अपने स्तर के अनुरूप स्थान अर्जित कर लेगा | चरित्र के शील के शैल पर हम जितने उंचे चढेंगे, उतने उंचे किसी भी क्षेत्र मे चढेंगे, बिना रुके अबाध गती से | हमारा शील, हमारा चारित्र्य जितना उच्च, हमारा स्थान भी उतना ही श्रेष्ठ होगा, हमारा प्रभाव भी उतना ही अधिक होगा |                                                                 भगिनी निवेदिता


१३३ वीर

                                                                        १३३ वीर 

१  

         वीर कौन है ? वीर वह है - जो अपने धर्म को समझता है और चिरंतन सत् तत्व के ज्ञान का और अति समृद्ध विजयी ऐहिक जीवन का अर्थात् अभ्युदय  और नि:श्रेयस का - संयोग है | इस महान धर्म का साक्षात्कार केवळ उन्हीं को हो सकता है, जो सद्गुण-संपन्न और वीरमनस्क हैं,  उनको नही जो कायर हैं,  कमजोर हैं | यह महान सत्य दुर्बलों के लिए नही है | केवल वीर, सबल, साहसी और ऐसे लोग सफल हो सकते हैं, जो दुनिया में किसी भी बात का सामना बिना विचलित हुए पुरी शक्ती के साथ, तथा अपने मन का पूर्ण संतुलन रखते हुए कर सकते हैं |        प. पू. श्रीगुरुजी



१३२ समाजाचे संघटन

                                                            १३२  समाजाचे संघटन 

१  

         संघ ने समाज के अंदर एक पृथक् संघटन की बात कभी सोची ही नहीं, संघ ने अपने अस्तित्व में आने के समय से ही समाज के किसी एक वर्ग को अलग इकाई के रूप में संघटित करने का नहीं, अपितु संपूर्ण समाज को संस्कारीत करने का लक्ष्य स्पष्ट रूप से निर्धारित किया है | यही कारण है कि, संघ के कार्यकर्ता कभी भी लोगों के सामने अपने आपको ' संघी गुट ' के रूप में प्रस्तुत नहीं करते | यद्यपि उनमें से हजारों अकाल, बाढ पाकिस्तान से आये शरणार्थियों के प्रवाह इत्यादी राष्ट्रीय दुर्घटनाओं के समय अपने सर्वस्व का दांव लगाकर कार्य करते हैं | वे समाज के एक सामान्य नागरिक के रूप में रहना पसंद करते हैं और इस प्रकार वे उदाहरण प्रस्तुत करते हैं की सामान्य मनुष्य को एक संघटित, सजग सामाजिक जीवन में किस प्रकार व्यवहार करना चाहिए | इस प्रकार का सुगठीत, राष्ट्रप्रेमी और आत्मनिर्भर राष्ट्रजीवन ही अनंत और अपार शक्ती से अपने राष्ट्र को सुदृढ बना सकता है |            प.  पू. श्रीगुरुजी


शुक्रवार, २४ जानेवारी, २०२५

१३१ व्यवसायी मंडळी

                                                                              १३१  व्यवसायी मंडळी 

१  

           जेव्हा सामान्य जीवन व्यतीत करणारे, आपापले उद्योगव्यवसाय सांभाळणारे, नीटनेटका संसार करणारे लोक जेव्हा सर्व प्रकारे संघाचे काम करू लागतील तेव्हा संघाला समाजात मनाचे योग्य स्थान प्राप्त होईल. प्रचारकांच्या बाबतीत लोक बोलतात की, ' याला ना मुले बाळे, ना कामधंदा ! ' परंतु वकील, डॉक्टर अन्य व्यवसाय करणारी मंडळी संघचालक पदासारखी जबाबदारी अंगावर घेऊन ती यशस्वी करून दाखवतात तेव्हा त्याचा समाजावर मोठा परिणाम होतो. यासाठी लवकरात लवकर स्थानिक कार्यकर्ते उभे राहणे फार आवश्यक आहे.