सोमवार, २७ जानेवारी, २०२५

१३४ चारित्र्य

                                                       १३४  चारित्र्य 

         जिस प्रकार हमारी प्रत्येक कृति में हमारा व्यक्तित्व अभिव्यक्त होता है, उसी प्रकार इन अनेक कृतियों को मिलाकर बना हुआ हमारा जीवन हमारा चरित्र प्रकट करता है | हम जो कुछ है अपने चिंतन के परिणाम है | अभियंता कहते हैं, कि जल अपने समतलतक पहुंचता है |जो बात जल की वही मनुष्य की | मनुष्य जहां भी रहेगा अपने स्तर के अनुरूप स्थान अर्जित कर लेगा | चरित्र के शील के शैल पर हम जितने उंचे चढेंगे, उतने उंचे किसी भी क्षेत्र मे चढेंगे, बिना रुके अबाध गती से | हमारा शील, हमारा चारित्र्य जितना उच्च, हमारा स्थान भी उतना ही श्रेष्ठ होगा, हमारा प्रभाव भी उतना ही अधिक होगा |                                                                 भगिनी निवेदिता


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