१३२ समाजाचे संघटन
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संघ ने समाज के अंदर एक पृथक् संघटन की बात कभी सोची ही नहीं, संघ ने अपने अस्तित्व में आने के समय से ही समाज के किसी एक वर्ग को अलग इकाई के रूप में संघटित करने का नहीं, अपितु संपूर्ण समाज को संस्कारीत करने का लक्ष्य स्पष्ट रूप से निर्धारित किया है | यही कारण है कि, संघ के कार्यकर्ता कभी भी लोगों के सामने अपने आपको ' संघी गुट ' के रूप में प्रस्तुत नहीं करते | यद्यपि उनमें से हजारों अकाल, बाढ पाकिस्तान से आये शरणार्थियों के प्रवाह इत्यादी राष्ट्रीय दुर्घटनाओं के समय अपने सर्वस्व का दांव लगाकर कार्य करते हैं | वे समाज के एक सामान्य नागरिक के रूप में रहना पसंद करते हैं और इस प्रकार वे उदाहरण प्रस्तुत करते हैं की सामान्य मनुष्य को एक संघटित, सजग सामाजिक जीवन में किस प्रकार व्यवहार करना चाहिए | इस प्रकार का सुगठीत, राष्ट्रप्रेमी और आत्मनिर्भर राष्ट्रजीवन ही अनंत और अपार शक्ती से अपने राष्ट्र को सुदृढ बना सकता है | प. पू. श्रीगुरुजी
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