बुधवार, २२ जून, २०१६

३३ . हिंदुत्व

                                ३३ हिंदुत्व  
    

           अपने देश में एक जन है। एक संस्कृति है।  एक राष्ट्र है।  हमारी यह मातृभूमि है, हम उसकी संतान है।  हम सब एक परिवार के सदस्य है।  राम-कृष्ण हमारे राष्ट्रीय पुरुष है।  वेद-उपनिषद्, रामायण- महाभारत आदि हमारे राष्ट्रीय ग्रंथ है। यहाँ के जो उत्सव है वे हमारे राष्ट्रीय उत्सव है। यहाँ की परंपरा राष्ट्रीय परंपरा है। उस शास्त्रीय विचार को लेकर हमने कहा है कि हिंदुत्व यही राष्ट्रीयत्व है।   
                                                                                                          -  दत्तोपंत ठेंगडी 
            हिंदुत्वाचा वारसा हीच राष्ट्रीय एकात्मतेची सर्वाधिक शक्ती आहे, जिने विभिन्न जाती आणि धार्मिक विभिन्नतेतही ' एक राष्ट्र ' बनविले. आज आपण पाहतो की, पृथ्वीवरील साऱ्या प्राचीन संस्कृती नष्ट झाल्या  आणि जगातल्या प्रचंड शक्तींच्या सतत होणाऱ्या  आघातातूनही  भारत एक राष्ट्र म्हणून जिवंत राहिला. या  सर्वांचे  खरे  कारण  हेच की भारताच्या  इतिहासात  हिंदुत्व  हेच एकात्मतेचे आधारभूत तत्व राहिले. हिंदुत्व हे असे ऐक्यसूत्र आहे की ज्यामुळे सर्वांना एकात्म राष्ट्राच्या स्वरुपात सामावून टाकले.

३ 
        हिंदुस्थानातील अतिश्रेष्ठ योग्यतेच्या हिंदू मनाकडून हिंदुत्वासंबंधी सर्वकष विचार इतिहासकालात येथे प्रथमच झालेला दिसतो. यानंतर युगानुयुगापर्यंत जिज्ञासू हिंदूला आणि आपल्या मुलांना धर्म शिकवणाऱ्या मातेला निश्चित ज्ञान आणि प्रेरणा प्रकाश यासाठी याच पुस्तकाची पाने उलटावी लागतील.                                                                   -  भगिनी निवेदिता 

४ 
        हिंदुत्व म्हणजे गतिमानता, स्थितीशीलता नव्हे . हिंदुत्व एक प्रक्रिया आहे, परिणाम नाही . हिंदुत्व एक विकासशील परंपरा आहे, अपरिवर्तनीय ईश्वरीय आदेश नाही . त्याचा जुना इतिहास पाहिल्यानंतर आपल्याला असे विश्वासाने म्हणता येईल की, इतिहासाच्या आणि चिंतनाच्या क्षेत्रात निर्माण होणाऱ्या कोणत्याही संकटाला तसेच आह्वानाला, हिंदुत्व पूर्ण सामर्थ्यानिशी तोंड देईल . 
                                                                  - सर्वपल्ली राधाकृष्णन 

     मीनाक्षीपुरम ची घटना देशभरातील हिंदूंना संकटाची सूचना ठरली. तामिळनाडूतील हिंदू विशेषत्वाने जागे झाले. सर्व मठाधिपती आपल्या मठातून बाहेर पडले. स्पृश्य-अस्पृश्य सर्व जाती जमातींचे पंथांचे प्रमुख हिंदू एकता संमेलनात सामील होऊ लागले. समता व सामंजस्य यांचा घोष त्यांच्या भाषणातून होऊ लागला. सामाजिक व धार्मिक नेत्यांनी शेकडो वर्षांनी उपेक्षित बंधूंना प्रेमाने आलिंगन दिले. त्यांचे कुशल विचारले. त्यांना त्यांच्या पूर्वीच्या धर्मात परत सुप्रतिष्ठित केले. ही सर्वात महत्त्वाची बाब होय. अशा प्रकारे पुन्हा हिंदुत्वाची लाट उत्पन्न झाली.

        " हिंदू "शब्द के आसपास जो विचार और आदर्श, संरचनाऍं और समाज, भाव और भावनाऍं केंद्रीभूत हुई हैं वे इतनी विविध और इतनी संपन्न, इतनी शक्तिशाली और इतनी सूक्ष्म, इतनी मायावी फिर भी इतनी स्पष्ट हैं की " हिंदुत्व " शब्द का विश्लेषण करना ही एक टेढी खीर बन गया है | अधिक नहीं तो कम से कम चालीस शताब्दीयों ने अपने क्रियाकलापों से इसे गढा है |अनेक ईशदूत और कवि, विधी-निर्माता और विधिवेक्ता, शूर और इतिहासज्ञ, इस बात के लिए जिये, लढे और मरे कि यह शब्द ऐसाहि बना रहे | और क्यों न हो, क्या यह शब्द हमारी जाती की ऐसी असंख्य कृतियों का परिपाक नहीं है, जो कभी टकरायी तो कभी धुलमील गयीं और कभी हाथ में हाथ डालकर परस्पर सहयोग करती रहीं ? हिंदुत्व एक शब्द नाहीं बल्कि एक इतिहास है |                                     वीर सावरकर

        ज्या भारतात उत्तरेत मायापुरी, मध्यभागात अवंतिका आणि दक्षिणेत कांची अशी पवित्र नगरे आहेत, ज्या देशात गंगा, सिंधू, सरस्वती व दक्षिणेत असलेली कावेरी या नद्यांना पवित्र मानतात, ज्या देशात चारी दिशांना पवित्र तीर्थे स्थापिलेली आहेत, अशा देशाला एक सूत्रात गुंफणारी एक विचार प्रणालीही नक्कीच आहे.                                                                    डॉ . संपूर्णानंद

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