बुधवार, २२ जून, २०१६

१७ . हिंदू धर्म


                                                                      १७ . हिंदू धर्म

      
             हिंदू धर्म म्हणजे न थांबणारा, अविश्रांत पुढे जाणारा सत्याचा शोध घेण्याचा मार्ग आहे . आज हा धर्म मरगळल्यासारखा वाटतो याचे कारण आपण थकलो आहोत, धर्म थकला नाही . ज्या क्षणी आपल्यातला हा थकवा नाहीसा होऊन, आपण उत्साहात काम करायला लागू त्या क्षणी हिंदू धर्माचा मोठा विस्फोट होईल आणि भूतकाळात कधीही नव्हता इतक्या मोठ्या प्रमाणात जगापुढे आपल्या प्रभावाने आणि प्रकाशाने तो चमकून उठेल . 
                                                                         -  महात्मा गांधी 
       धर्म किती का गूढ असेना, पण साधी गोष्ट अशी आहे कि, दुसऱ्याला पीडा देणे हा अधर्म आहे आणि आनंद देणे हा धर्म आहे. आपण आपापसात एकमेकांना अनुकूल बनणे हा धर्म आहे. धारणाशक्ती हे धर्माचे मूळ तत्व आहे. जो व्यवहार आपलेशी केला असता आपल्याला कष्टदायक वाटेल तो व्यवहार दुसऱ्याशी करू नका. वस्तुतः आत्मीयता हाच समष्टीमार्गाचा आधार आहे. संपूर्ण समाजाविषयी आपलेपणा निर्माण करणे, अहंभाव सोडून देऊन आत्मभाव जागविणे हाच खरा धर्म आहे. यानेच समाजाची धारणा होते. 
          जगांतील सर्व वादांचा ( वादांचा) अभ्यास करावा आणि आपल्या संस्कृती व परंपरा याचे चिंतन करावे.अभ्यास सर्व पद्धतींचा व्हावयास हवा. परंतु कोणाचे अंधानुकरण मात्र करणे आपल्या हिताचे नाही. प्राचीन काळापासून राष्ट्र रचनेचा आधार असलेला धर्म आमच्या गहन चिंतनाचा विषय होणे आवश्यक आहे.

४ 
          धर्माची पुनर्स्थापना होईल तेव्हाच हे राष्ट्र उभे राहील. समान परंपरा, समान परिश्रम,  समान भविष्यकाळ आणि समान आशा-आकांक्षा या सर्वांच्या आधारावर हे राष्ट्र पुनरपि उभे राहील.
                                                                                               - भगिनी निवेदिता 
     हिंदुधर्मः नैतिक जीवनं महत्वपूर्ण मन्यते | तथैव सर्वेषु वर्गेषु भ्रातृत्वं स्थापयितुम्  इच्छति | ये च नैतिक नियम धारितस्य मार्गस्य अनुसरणं स्वकर्तव्यं मन्यते | हिन्दुधर्मः कश्चन संप्रदायः न | प्रत्युत स कश्चन महान भ्रातृसंघः यश्च सत्यं मानयति सत्यान्वेषणं निष्ठापूर्वकं तत्परोभवति च |
                                                                                               -   डॉ . राधाकृष्णन 
     शत शत वर्षांच्या मोहनिद्रेनंतर आज आम्ही धर्माच्या सृजनात्मक युगात उभे आहोत. आम्ही आपल्या धर्माकडे नव्या दृष्टीने पाहण्याचा प्रारंभ केला आहे. आम्हाला हे जाणवते की आमचा समाज आज संतुलित अवस्थेत आहे. अनेक विकृती आणि विकारांनी ग्रासलेला आहे. आज हे सारे धुवून काढण्याची आवश्यकता आहे. हिंदू धर्माच्या शाश्वत आधारभूत सिद्धांतांना तिलांजली द्यावी अशी काळाची मागणी नसून उलट त्या सिद्धांताची उकल नव्याने मांडणे अत्यंत आवश्यक आहे. असे करणे म्हणजे काही नवा प्रयत्न आहे असे नव्हे तर हिंदू धर्माच्या इतिहासात कितीतरी वेळा केल्या गेलेल्या प्रयत्नांची ही केवळ पुनरावृत्ती असेल.  -                                                डॉ. राधाकृष्णन

    जे कोणी हिंदू संस्कृती आणि जीवनपद्धतीचा स्वीकार करतात ते सर्वच हिंदू आहेत. मग ते आस्तिक, नास्तिक, जडवादी किंवा संशयवादी कोणीही असोत. हिंदु धर्म जीवनाच्या आध्यात्मिक व नैतिक दृष्टीवर भर देतो; धार्मिक समजुतीवर नव्हे. या किंवा त्या धर्ममतावर श्रद्धा ठेवणारा म्हणून नव्हे, तर सत्कार्य करणाऱ्यास कधीच दुर्गती प्राप्त होत नाही. " न हि कल्याणकृत कश्चिद् दुर्गतिं तात गच्छति | "                                                                                                    डॉ. राधाकृष्णन्
         हिंदू धर्म समन्वयवादी है | जिन लोगों ने हिंदू आचार, व्यवहार तथा जीवनदर्शन को स्वीकार कर लिया, हिंदू धर्म की ' एक सत् विप्रा: बहुधा वदन्ति ' की भावना को स्वीकार कर सहअस्तित्व के आधार पर हिंदू समाज की हित कामना में लग गये, वे सब हिंदू हो गये | सामाजिक लचक हिंदू धर्म की विशेषता रही है | सनातन धर्म माननेका अर्थ - स्थिर खडा हो जाना नहीं है, इसका अर्थ है, इसके महत्त्वपूर्ण सिद्धांतों को जान समझकर वर्तमान संदर्भ और देशकाल परिस्थितियो के अनुसार इन पर अमल करना |                                                            डॉ. राधाकृष्णन्

       हमारा अपना धर्म सब धर्मोसे अधिक संदेहवादी और सबसे अधिक विश्वासी है - सबसे अधिक संदेहवादी इसलिए की इसने सबसे अधिक प्रश्न उठाये हैं और परीक्षण किये हैं, सबसे अधिक विश्वासी इसलिए की इसके पास गंभीरतम अनुभूति तथा सबसे अधिक विविधतापूर्ण एवं भावात्मक अध्यात्मिक ज्ञान है | यह विशालतर हिंदू धर्म, जो कोई एक मतवाद या मतवादों का समुदाय नहीं है, बल्कि अतीत और भावी सामाजिक विकास की आत्मा है, जो किसी का निराकरण नहीं करता, परंतु प्रत्येक चीज को परखने और अजमाने के लिए आग्रह करता है और परख और आजमा चुकने के बाद से आत्मा के उपयोग में लाने का आग्रह करता है, उस हिंदू धर्म में हम भावी विश्व धर्म का आधार पाते हैं | इस सनातन धर्म के अनेक धर्मशास्त्र हैं - वेद, वेदांत, गीता, उपनिषद, दर्शन, पुराण, तंत्र और यह बायबल और कुरान से भी इन्कार नहीं करता | पर इसका वास्तविक सबसे अधिक प्रामाणिक धर्मशास्त्र तो उस हृदय में है, जिसमें सनातन देव का वास है |.                                               योगीराज अरविंद

१०
         हमने अपने सामने जो काम रखा है, वह यांत्रिक नहीं है, किंतु नैतिक और आध्यात्मिक है | हमारा लक्ष्य किसी एक प्रकार की सरकार को बदल डालना नही है, प्रत्युत एक राष्ट्र का निर्माण करना है | उस काम का राजनीति भी एक भाग है, परंतु एक भाग मात्र | हम अपनी सारी शक्ती राजनीती पर ही नहीं लगायेंगे | ना ही केवल सामाजिक प्रश्नों पर या ब्रह्मविद्या या दर्शन या साहित्य या विज्ञान के विषयों पर, परंतु इन सब को हम एकही वस्तु के अंतर्गत समझते हैं, जिसे हम सबसे आवश्यक मानते है | वह वस्तु है धर्म, राष्ट्रीय धर्म, जो हमारा विश्वास है सार्वभौम भी है |              योगीराज अरविंद

कोणत्याही टिप्पण्‍या नाहीत:

टिप्पणी पोस्ट करा