बुधवार, २२ जून, २०१६

२८ . गुण संवर्धन

                             २८ गुण संवर्धन 


        जो समाज आपल्या सर्वांगीण उत्कर्षासाठी आवश्यक गुणांचे संवर्धन करतो आणि त्या उज्ज्वल गुणांची एक परंपरा निर्माण करून अशी एक व्यवस्था उत्पन्न करतो की, ज्यामुळे एका पिढीतून दुसर्या पिढीत त्या गुणांचा विकास होत जावा, तोच समाज आपले जीवन सार्थकी लावून या जगामध्ये एक सुस्थिर व संरक्षित समाज या नात्याने चिरंतन राहतो . अशा गुणांच्या सतत संवर्धनाने तो विशाल होत जातो व विशाल होत असतानाच त्याची विजीगीषाही वाढत जाते . 
                                                                         - भय्याजी  दाणी 
          राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघाने कल्पिलेल्या वैभवाच्या रुपरेषेत सामान्य माणसालाच प्रमुख स्थान दिले गेले आहे. सामान्य माणसाच्या राष्ट्रीय व व्यक्तिगत चारित्य्राची पातळी उंचावण्यासाठी आम्ही प्रयत्नशील आहोत. सर्वसामान्य माणसाच्या जीवनात जितक्या प्रमाणात उत्कृष्ट गुण असतील तितक्या प्रमाणात देश मोठा व प्रगतिशील मानला जाईल. 

         संघकार्य का उद्देश समर्थ, गुणसंपन्न, मनोहारी, चरित्रवान, प्रामाणिक, निर्भय, कर्तव्यकठोर, त्यागी, विजिगिषु वृत्ती के लोगों की परंपरा निर्माण करना और उनके जीवन में इन गुण सुमनोंसे व्याप्त सुगंधी के द्वारा समाज में सामूहिक जीवन की आदत निर्माण कर संपूर्ण समाज में इन्ही गुणो की निर्मिती करना है | जिस प्रकार स्वर्ण आग में तपाने से शुद्ध ही होता है, उसी प्रकार कर्तव्य-पथ पर अग्रसर होने वाले व्रती लोगों के गुणों में संकट से संघर्ष लेने के कारण कुछ चमक ही आती है | इस प्रकार गुणों का विकास हो कर, अशुद्धता नष्ट होकर, ऐसे लोगों का सामर्थ्य और आकर्षण दोनों बढते हैं |.                                                                 मा. भैय्याजी दाणी

कोणत्याही टिप्पण्‍या नाहीत:

टिप्पणी पोस्ट करा