बुधवार, २८ ऑगस्ट, २०१९

१२६ सिंधु नदी

                            १२६   सिंधु नदी

   जिच्या काठावर आमच्या प्राचीनतम वेदर्षींनी ऋचांची पहिली सामगायने गायिली, जिच्या पुण्यसलीलांनी आपल्या संध्यावंदनातील अर्घ्ये दिली आणि जिला अत्यादराने वेदातील देवतांमध्ये स्थान देऊन तिच्यावर सुंदरातील सुंदर सुक्ते रचली त्या तुला, हे अंबितमे, नदीतमे, देवीतमे  सिंधू आम्ही कधीही विसरणार नाही . 
     तुझ्या परिसरामध्ये आमच्या प्राचीनतम राजर्षींनी नि ब्रह्मर्षींनी केलेल्या यज्ञांच्या प्रदीप्त हुताशनात जेव्हा हवि समर्पिले तेव्हा अंतराळात उंच उंच दरवळत गेलेल्या त्यांच्या सुगंधांनी लालापित होऊन इंद्र, वरुण, मरुतादिक देव त्यांचे हविर्भाग स्वीकारण्यास तुझ्या तीरी येत आणि सोमरसासमवेत तुझे सुमधुर सलिल पिऊन प्रसन्न होत, त्या तुला हे सुरसरिते सिंधू , आम्ही कधीही विसरणार नाही ! 
                                                                 - स्वा. सावरकर 
        नहीं नहीं ! सारा विश्व भी यदि हमारा द्वेष करने लगे अथवा सारे विश्व का हमें द्वेष करना पडा, तो भी हम सिंधू से हमारा रिश्ता छोडेंगे नहीं, तोडेंगे नहीं | सिंधू को हम कैसे भुलेंगे | सिंधू के बिना हिंदू ? अर्थ के बिना शब्द ? प्राणो के बिना शरीर ? असंभव, असंभव | जब तक एक भी हिंदू जीवित है तब तक सिंधू को भूलना संभव नही |
                                                                       -  बॅ. सावरकर
 
                                                               

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