गुरुवार, ११ डिसेंबर, २०२५

१६४ यज्ञचक्र

                                                                           १६४ यज्ञचक्र 

        व्यष्टी, समष्टी, सृष्टी व परमेष्टी ही आपल्यासमोर चारही तत्वे परस्पर सहकार्यानेच सुखदायी होतात. व्यक्ती समाजावर अवलंबून आहे तर समाज सृष्टीवर अवलंबून आहे. आणि साऱ्या सृष्टीचे संचालन परमेश्वर करतो. परमेश्वराची इच्छा पूर्ण करण्याचे साधन बनण्यातच व्यक्तीला धन्यता वाटते. या सर्वांमध्ये जोपर्यंत काही ताळमेळ आहे तोपर्यंत सर्व काही ठीक चालते. यालाच ' यज्ञचक्र ' असे म्हटले आहे.                                          पं . दीनदयाळ उपाध्याय


१६३ स्वराज्य

                                                                    १६३ स्वराज्य 

         ' स्वराज्य 'या संकल्पनेत ३ गोष्टी प्रमुखपणाने येतात. पहिली गोष्ट ही की, जे या राष्ट्राचे घटक आहेत त्यांनी हे राज्य चालवावयाचे आहे. दुसरी गोष्ट म्हणजे राष्ट्राच्या हिताप्रमाणेच राज्य चालले पाहिजे. अर्थात राष्ट्रीय हिताच्या नितीनुसार राज्य चालले पाहिजे. आणि तिसरी गोष्ट म्हणजे राज्यामध्ये राष्ट्रहित साधण्याचे आपले स्वतःचे सामर्थ्य असले पाहिजे. म्हणजेच स्वावलंबनाशिवाय स्वराज्याची कल्पना करणे निखालस चूक आहे.             दीनदयाळ उपाध्याय

१६२ त्याग

                                                                          १६२ त्याग 

       मुख्य बात है त्याग की, बिना त्याग के कोई भी अपना संपूर्ण अंत:करण उंडेलकर अन्यों के लिए कार्य नही कर सकता | त्यागी व्यक्ती सबको समान दृष्टी से देखता है और सब की सेवा में अपने आपको लगाता है | कोई भी बाधा सत्य, प्रेम और प्रामाणिकता को नही रोक सकती | क्या तुम प्रामाणिक और मृत्युपर्यंत निस्वार्थी हो ? तब डरो मत, मृत्यू से भी नहीं |                                                                                                     स्वामी विवेकानंद

बुधवार, १० डिसेंबर, २०२५

१६० पाचनशक्ती

                                                               १६० पाचनशक्ती

         दुसऱ्याच आत्मसात करण्यासाठी प्रतिभाशक्ती आवश्यक असते. इतरांच्यात प्रवेश करण्याची शक्ती आणि त्यांना पूर्णतः आत्मसात करून टाकण्याची जादू हीच त्या प्रतिभाशक्तीची वैशिष्ट्ये आहेत. अशा प्रतिभाशक्तीचे दर्शन भारतात घडते. भारतवर्षाने नि:संकोचपणे इतरांत प्रवेश केला आणि सहजपणे त्यांच्या कितीतरी गोष्टी आत्मसात केल्या. विदेशी लोक ज्याला ' पांतलिकता ' (मूर्ती पूजा) संबोधतात त्याला पाहून भारतवर्ष कधी भयभीत झाला नाही. किंवा त्याने आपले नाक मुरडले नाही. ( तोंडही वाकडे केले नाही-नापसंती व्यक्त केली नाही) भारताने पुलिद, शब्बीर, व्याध इत्यादीकांकडून काही हीन गोष्टींचा स्वीकार करून त्यांत आपल्या भावनांची भर घातली व त्यांचेमध्ये आपली आध्यात्मिकता प्रकट केली. भारतवर्षाने कुणालाही दूर लोटले नाही, सर्वांना जवळ घेऊन आत्मसात करून टाकले.                                                                                  रवींद्रनाथ ठाकूर

मंगळवार, ९ डिसेंबर, २०२५

१५९ तरुण

                                                                               १५९ तरुण 

        ध्येयवादी प्रतिभावंतांच्या कल्पनांना मूर्त रूप देण्यासाठी जेव्हा तरुण पुढे येतील तेव्हाच राष्ट्राचा अभ्युदय होईल. राष्ट्राचे जीवन उसळत्या रक्ताने सळसळणाऱ्या तरुणांवरच अवलंबून असते. क्षात्रवृत्तीशिवाय राष्ट्र जिवंत राहूच शकत नाही. जो स्वतःचे संरक्षण करू शकत नाही तो मनुष्यच नव्हे, निव्वळ भित्रा. अशा भित्रेपणापासून मुक्त राहून जो पौरुषाचा अंगीकार करील त्या व्यक्तीस अथवा त्या राष्ट्रास जगात प्रतिष्ठा प्राप्त होईल.


          भीषण संकटांचे आव्हान स्वीकारण्यातच ज्यांना मनस्वी आनंद वाटतो. त्यांच्या स्नायूंमध्ये तारुण्य सुलभ सामर्थ्य असते, डोळ्यात आदर्शाचे तेज असते; प्रतिकूल परिस्थिती आणि प्रलोभनांच्या वादळातही ते सागरासारखे गंभीर निश्चल राहू शकतात, असे तरुणच विजयामागून विजय संपादन करीत आपले अंतिम ध्येय साध्य करतात.                                                                                                                                       प. पू.  श्रीगुरुजी

१५८ जातीयता

                                                                       १५८  जातीयता 


       आपले नेतृत्व प्रस्थापित करण्यासाठी राजकीय पुढारीच जातीयवाद व सांप्रदायिक भेदभावांना भडकावीत असतात. अशा या राजकीय पुढाऱ्यांपैकी बहुतेक जण जातीयवादाचा पुरेपूर फायदा उठवितात. परंतु जेव्हा-केव्हा ते हिंदू समाजातील दोषांवर विशेषतः जातीव्यवस्थेवर बोलत असतात तेव्हा त्यांची जीभ मोकाट सुटते. व्यासपीठावरून ज्या जातीयवादाविरुद्ध जहरी टीकाटिप्पणी करीत असतात त्याच जातीयवादाचा आधार आपले पुढारी पण पक्के करण्यासाठी पडद्याआड घेत असतात. निवडणुकी समई जातीयतेचा विचार करून उमेदवार निवडतात.

१५७ साम्यवाद

                                                                              १५७ साम्यवाद 


           भौतिक दृष्टिकोनातून निर्माण झालेल्या लोकशाहीवादी शक्तीनी खरे बोलायचे तर लोकशाही सत्तेच्या आड दडून बहुसंख्य सामान्य जणांचे शोषण करणाऱ्या मूठभर पुंजीपती सत्ताधाऱ्यांनी सामान्य जनांना जगणे अशक्य करून टाकले. या सत्ताधाऱ्यांपासून मुक्ती मिळविण्यासाठी ज्या साम्यवादाचा विचार केला गेला तो सुद्धा भौतिकवादातूनच पुढे आला असल्यामुळे पशुतेच्या तांडवनृत्यालाच कारण झाला. विरोध विकास वाद हे समाजजीवनाच्या प्रगतीसाठी आवश्यक असे मानून अकारण भयानक रक्तपात, संहार व प्रलय यालाच कर्तव्य मानले. स्वर्गप्राप्तीची आशा दाखवून इस्लामने ज्याप्रमाणे शेकडो वर्षे हत्या मारपीट करून, पृथ्वीवर रक्ताच्या नद्या वाहविल्या त्याचप्रमाणे राज्यविरहित समाज निर्मितीच्या खोट्या आशावादाने कम्युनिस्ट पुन्हा एकदा संपूर्ण जगाला मानवी हत्याकांडाच्या खाईत ढकलण्यास कटिबद्ध आहेत.                                     बाळशास्त्री हरदास

         साम्यवाद आणि समाजवाद ही प्रगती नव्हे; प्रतिगती (पीछेहाट) आहे. यांच्यामुळे मानवाची पीछेहाट होते आहे. मानवी विकासक्रमाचा थोडा जरी अभ्यास केला तरी ही गोष्ट सहज लक्षात येते. मनुष्य आपल्या प्राथमिक अवस्थेत जडतत्त्वाचा विचार करतो आणि त्यातच रमून जातो. नंतर त्यास कंटाळतो, तेव्हा तो मानसिक पातळीवर पोहोचतो. विविध प्रकारच्या मानसिक प्रयत्नांनी तो आपले लक्ष विभाजित करतो. तदनंतर तो नाना प्रकारे बौद्धिक प्रगती करतो आणि तत्पश्चात सर्वांच्या पलीकडे जाऊन बुद्धीला अगम्य अशा परमात्म्याचा विचार करू लागतो. हीच त्याची खरी प्रगती असते.                                                                                प . पू. श्रीगुरुजी

सोमवार, ८ डिसेंबर, २०२५

१६१ संस्कृती

                                                                    १६१ संस्कृती

       पश्चिमेत उदयास आलेल्या राजनीतीप्रधान कार्यपद्धतीत विशेष करून कम्युनिस्ट कार्यपद्धतीत राजसत्तेलाच परिवर्तनाचे एकमेव साधन मानले जाते. व म्हणूनच सत्ताप्राप्ती हेच साम्यवादी पक्षाचे एकमेव ध्येय असते. त्यासाठी साहित्यिक, श्रमिक व विद्यार्थ्यांचे त्यांच्या अधिपत्याखाली मंच निर्माण केले जातात. संस्कृतीला केंद्रबिंदू मानून राजकारण हे राष्ट्रजीवनाचे केवळ एक अंग आहे असे मानले जाऊ शकते व संस्कृतीच्या प्रकाशात जीवनाचे प्रत्येक क्षेत्रात राष्ट्रीय पुनर्निमाणाच्या दिशेने, रचनात्मक प्रयोग केले जाऊ शकतात. हे साम्यवादी बुद्धिमंत्तांना समजणे सुद्धा कठीण आहे.

१५६ समर्पण

                                                                १५६ समर्पण 

          कधी कधी स्वयंसेवकांच्या मनात काही दान करावे असा विचार येतो. पण दान करणारा तो कोण ? एकदा स्वयंसेवक झाला म्हणजे तो स्वतःच संघाचा होत असतो. मग त्याच्या जवळ दान करण्यासाठी उरतेच काय ? आणि मग पैसे देऊन स्वयंसेवकांची आपल्या कर्तव्यातून सुटका होत नाही. कारण ' काया, वाचा किंवा मनाने ' असे आपण प्रतिज्ञेत म्हटलेले नाही तर तेथे तन-मन-धनाचा एकत्रित उल्लेख आहे. आपली सर्व ऐच्छिक सुख संपत्ती संघ कार्यासाठी देईन अशीच भावना या एकत्रित उल्लेखात आहे. यालाच म्हणायचे समर्पण.                                    - पू . श्रीगुरुजी  

१५५ देशभक्ती

                                                          १५५  देशभक्ती 

         ईसाई, मुसलमान  व हिंदू हे सर्व एकत्र रहावेत असे केवळ हिंदूच म्हणतात. ख्रिस्ती वा मुसलमान म्हणत नाहीत. आमचा कोणत्याही उपासनापद्धतीशी विरोध नाही. परंतु राष्ट्राच्या विरोधात जो उभा राहील तो जरी मुलगा असला तरी त्याच्याबरोबर आमचा व्यवहार कठोर राहील. अहिल्याबाई, शिवाजी महाराजांचा आदर्श व्यवहार आमच्या समोर आहे. जर कोणी राष्ट्रविरोधी, अन्य मतावलंबी झाला तर त्याच्या बरोबरचा आमचा व्यवहार अहिल्याबाई वा छत्रपती शिवाजी महाराजांसारखा राहील, असे म्हणण्याची टाळाटाळ कोणी करू नये. 

रविवार, ७ डिसेंबर, २०२५

१५४ पंथ

                                                              १५४  पंथ 

        रिलिजन की मतांध कल्पना तथा राज्यसत्ता पादरीयों के हात में होने के कारण पाश्चात्य देशों ने बहुत सदियों तक कष्ट भोगे हैं | उक्त कल्पना से धर्म की हमारी कल्पना प्रकाश और अंधकार के समान भिन्न है | धर्म अथवा आध्यात्मिकता कोई अंधमत नही है अपितु संपूर्ण जीवन का एक दृष्टिकोन है | राजनीतिक अथवा आर्थिक क्षेत्रों के समान राष्ट्रजीवन का कोई अलग क्षेत्र नहीं है | आध्यात्मिकता हमारे दृष्टी में जीवन की एक व्यापक दृष्टी है, जिसे सामाजिक जीवन के सभी क्षेत्रों को अनुप्राणित और उन्नत कर उनके बीच समन्वय की स्थापना करनी चाहिये |                                                                                                                     श्री गुरुजी

            धर्मनिरपेक्षतेच्या चुकीच्या व्याख्येने आम्ही आपल्या नवयुवकांच्या पिढीला आपल्या गतकाळापासून वंचित केले असून भविष्याविषयी काहीच मार्गदर्शन केलेले नाही. ज्या कार्यास ते हातभार लावू शकतील अशी नवीन विश्वाची कसलीच कल्पना आम्ही त्यांच्यासमोर उभी केलेली नाही. अशा लोकांना अथवा मानव जातीलाही देता येईल असा काही संदेश आपणास जवळ नाही.                                                                           संपूर्णानंद

१५३ विश्वसंचार

                                                                               १५३  विश्वसंचार  

           नद्या, पर्वत आणि सागर यांना उल्लंघून देश काळाच्या अडथळ्यांना जणू नगण्य ठरवून भारतीय चिंतनाचे रक्त पृथ्वीवर राहणाऱ्या अन्य वंशाच्या धमन्यांमध्ये कित्येक ज्ञात, अज्ञात, स्पष्ट, अनिर्वचनीय मार्गांनी आतापर्यंत वाहत आले आहे व आज देखील वाहत आहे. बहुधा, जगाच्या प्राचीन ज्ञानभांडारात आपला सिंहाचा वाटा आहे.                                                                                                                                       स्वामी विवेकानंद

शनिवार, ६ डिसेंबर, २०२५

१५२ संन्याशी

                                               १५२    संन्याशी 

       लोकमत परिष्कार का कार्य वही कर सकता है, जो लोकेषणाओं से ऊपर उठ चुका हो | भारत ने इसका समाधान खोज निकाला है | भारत ने इसका समाधान राज्य के हाथ से लोकमत निर्माण के साधन छीनकर किया है | लोकमत परिष्कार का कार्य है -  वीतरागी द्वंद्वातीत संन्यासियों का | लोकमत के अनुसार चलने का काम है - राज्य का | संन्यासी सदैव धर्म के तत्वों के अनुसार जनता के ऐहिक एवं आध्यात्मिक समुत्कर्ष की कामना लेकर अपने वचनों एवं निरीह आचरण से जनजीवन के ऊपर संस्कार डालते रहते हैं, उन्हे धर्म की मर्यादाओं का ज्ञान करते रहते हैं | कोई लोभ और मोह न होने के कारण वे सत्य के उच्चारण सहज कर सकते हैं |  लोकशिक्षा और लोक संस्कार के वही केंद्र हैं | शिक्षा और संस्कार से ही समाज के जीवनमूल्य बनते और सुदृढ होते हैं | इन मूल्यों को बांध रखने के बाद लोकेच्छा की नदी कभी अपने चटों को अतिक्रमण कर संकट का कारण नहीं बनेगी |                                पं. दीनदयाळ उपाध्याय

शुक्रवार, ५ डिसेंबर, २०२५

१५१ साधना

                                                                १५१   साधना 

१ 

           मानवी जीवन रूपांतरीत करणे हाच साधनेचा अर्थ आहे. जीवनाच्या रूपांतरासाठी केवळ बाह्य परिवर्तनाने भागणारे नाही. त्यासाठी मानवी जीवन नवीन आदर्शांच्या आधारावर अनुप्राणीत केले पाहिजे. त्या आदर्शाचे अनुसरण करताना आपणास आहुती दिली पाहिजे. आदर्शाच्या बलिवेदीवर स्वतःच बळी दिल्यानंतर माणसाचे विचार, उक्ती आणि कृती यात एकसूत्रता येते. त्याचे अंतर्बाह्य रूप एक होते. संपूर्ण जीवन एका आदर्श सूत्रात गुंफले जाते. या क्षणी तो जीवनाचा नवीन रस, नवीन अर्थ, नवीन आनंद शोधू शकतो. त्याच्यासमोर समग्र विश्व नव्या प्रकाशात प्रकट होते.                                                                                                                                                नेताजी सुभाष



गुरुवार, ४ डिसेंबर, २०२५

१५० एकरस राष्ट्रजीवन

                                                                         १५०    एकरस राष्ट्रजीवन 

        आज आपल्याला प्रत्येक मनुष्याच्या अंत:करणात अशी अनुभूती निर्माण करावयाची आहे की, काश्मीरपासून कन्याकुमारीपर्यंत भिन्न भिन्न विचार प्रवाह संप्रदाय पंथोपपंथ जाती उपजाती आणि विविध भाषाभाषी असे आपण सर्व मिळून हा एक अखंड समाज आहे, आपले हे अखंड राष्ट्र आहे व आपले सर्वांचे मिळून एकरस राष्ट्र जीवन आहे. अशा प्रकारच्या सहानुभूतीने प्रत्येकाचे जीवन परिपूर्ण करण्यासाठी आपण प्रयत्नशील असले पाहिजे.