शनिवार, २४ जानेवारी, २०१५

१. प. पू . डॉक्टरजी

                           प. पू . डॉक्टरजी 

     आपल्या डॉक्टरांचे जीवन तत्वरूप बनले होते. त्यांचे जीवन भव्य, स्फूर्तिप्रद राष्ट्र्कार्याशी समरस,एकरूप झाले होते.अनेक श्रेष्ठ गुणांच्या पैलुंनी त्यांचे जीवन विकसित झाले होते. त्यांच्या श्रेष्ठतम जीवनाचा काही अंश आपणाशी प्राप्त व्हावा, त्यांच्यासारखे निरलस राष्ट्रभक्तीने ओथंबलेले अन्त्ह्करण लाभावे यासाठी आपण त्यांचे नित्य स्मरण केले पाहिजे. त्यांचे श्रेष्ठ गुण अंगी आणल्याने आपल्या राष्ट्राचे सुख समृद्धीयुक्त एकात्म जीवन निर्माण करण्याचे सामर्थ्य आपल्या अंगी येईल. 
           संघटन शास्त्राची प्रत्यक्ष मूर्ती म्हणजे आपल्या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघाचे संस्थापक हे होत. त्यांचे जीवनात संघटनशास्त्राचे प्रत्यक्ष दर्शन घडते. आपण सद्गुणसंपन्न होऊन कसे जीवन जगावे याचा वस्तुपाठ आपण मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामाचे जीवन चरित्राचे अभ्यासाने शिकतो. तसे संघटन कसे करावे याचा वस्तुपाठ आपण संघ संस्थापकांच्या जीवनचरित्रावरून समजू शकतो. 
                                                                              - प. पू . श्रीगुरुजी
     डॉक्टर कोरे चिंतक नव्हते त्यांनी व्यक्ती निर्माणाकरिता, व्यक्तीच्या सुधारण्यासाठी दैनिक शाखा या आगळ्या वेगळ्या पद्धतीचा विकास केला आणि स्वतःच्या उदाहरणाने हजारो अंत: करणामध्ये ' हिंदू संघटन ' या स्वप्नाला साकार करण्याचा संकल्प जागृत केला.                     - पू. बाळासाहेब देवरस
     ऐसे थे संघ के संस्थापक, हमारे डॉक्टरजी ! मनुष्य मात्र के जीवंत हिंदू आदर्श, ' क्रियासिद्धी सत्वे भवति महतां नोपकरणे ' महान व्यक्ती महान कार्यों की सिद्धी बाह्य साधनों से नही अपितु अपने अंतर्निहित शक्ती के द्वारा करते हैं | इस लोकोक्ति की पूर्ण अभिव्यक्ती, सभी पीढियों के लिए एक मार्गदर्शक ज्योतिपुंज- जिसके प्रकाश में वे अपने जीवन को एक गौरवमय अमर राष्ट्रीय जीवन की उपलब्धि के लिए ढाल सकें |.                            श्रीगुरुजी
          “परमपूज्य डॉक्टरजींचे हृदय मातृभूमीच्या उद्धारासाठी मरेपर्यंत तळमळत राहिले.त्यांनी आपले संपूर्ण आयुष्य भारतभूमीसाठी अर्पण केले.डॉक्टरजींनी आपल्या आयुष्यातील क्षण - अन् - क्षण कारणी लावून,  हिंदू राष्ट्रात नवा प्रकाश पसरवून, हिंदू समाजाला एक नवी दृष्टी दिली.”                                                                          भैय्याजी दाणी
      संघ संस्थापक प. पू. डॉक्टरांनी भारतीय इतिहासाचा आमुलाग्र अभ्यास केला. जोपर्यंत संत महात्म्याचे प्रयत्नाने जनतेत भव्यता, उज्वलता निर्माण होत होती, समाज राजाश्रित नव्हता व संस्कारीत लोकांच्या आधारे कार्यरत होता तोपर्यंत राष्ट्र सुद्धा भव्य, दिव्य राहिले. परंतु कालांतराने जनतेत क्षुद्र भाव व स्वार्थ निर्माण झाला व त्यामुळे कोट्यावधी जनसंख्या व अतुल पराक्रम असून सुद्धा आपला देश मूठभर आक्रमकांकडून पराभूत झाला. या परिस्थितीत आमुलाग्र बदल करण्याच्या उद्देशाने डॉक्टरांनी संघ कार्याचा प्रारंभ केला.                                                                                                                                                                      यादवराव जोशी

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