गुरुवार, ३० जानेवारी, २०२५

१३६ मनःशक्ती

                                                                                 १३६  मनःशक्ती

     गंभीर चिंतन करून डॉक्टरांनी असा निष्कर्ष काढला की, लोकांच्या मनस्थितीमध्ये पूर्ण क्रांती होणे हीच आजची सर्वात मोठी आवश्यकता आहे. परकीय गुलामगिरी आणि इतर दोष दूर करण्याचा रामबाण उपाय मानसिक क्रांती हाच आहे. बाह्य क्रांती नाही.                                                                 परमपूजनीय श्रीगुरुजी

सोमवार, २७ जानेवारी, २०२५

१३५ हिंदु संगठन

                                                               १३५ हिंदु संगठन 

            राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघाचे कार्य एखाद्या नगरापुरते वा प्रांतापुरते मर्यादित नाही. आपला संपूर्ण हिंदुस्थान देश अतिशीघ्र सुसंगठीत करून स्वसंरक्षणक्षम व बलसंपन्न करण्याच्या उद्देशाने त्याचा आरंभ केलेला आहे. हा समाज असंघटित व विस्कळीत राहिला तर भविष्यात त्याचे अस्तित्व सुद्धा राहणार नाही व हिंदू संस्कृतीचे नावसुद्धा राहणार नाही.

     हिंदू समाजाचे आजच्या भयानक संकटापासून रक्षण करावयाचे असेल तर एक असे देशव्यापी नैतिक आंदोलन करावे लागेल की ज्यामुळे प्रत्येकाच्या अंतःकरणात आत्मचेतना जागृत होईल. ती जागृत होताच आत्मविश्वासाने स्वतःच्या शक्ती, सामर्थ्य, बल व पराक्रमाच्या आधारावर समाजातील प्रतिक्रियाशील, विरोधी शक्तींचे निर्दालन करून आत्मसन्मान आणि आत्ममर्यादांचे रक्षण करण्यास समर्थ होईल.                             - स्वामी प्रणवानंद

       आपल्या मनात जर ही दृढ धारणा असेल की हे राष्ट्र आपले आहे, इथे आपलेच राष्ट्र जीवन आहे. हे राष्ट्रजीवन श्रेष्ठ आणि संपन्न बनविण्याची जबाबदारी आपली आहे. ती जबाबदारी पूर्ण करण्यासाठी केवळ आजच्याच गोष्टीकडे लक्ष न देता चिरंतन स्वरूपात प्रत्येक व्यक्तीच्या हृदयात राष्ट्रभावना निर्माण करण्याच्या हेतूने एक सुव्यवस्थित व राष्ट्रीय कल्पनेने प्रभावित असे कार्य उभे केले पाहिजे.

         आम्हाला आपला हा हिंदुसमाज इतका सुसंघटित आणि शक्तिशाली बनवायचा आहे की, इतर समाजाच्या मनात हिंदुंबद्दल अगदी पाहता क्षणी आदर उत्पन्न झाला पाहिजे. येथे साध्य व साधन एकरूप आहेत. संघटन हेच साध्य व संघटन हेच साधन. सुसंघटित असणे हीच प्रत्येक जिवंत समाजाची स्वाभाविक अवस्था असते. कोणत्याही परिस्थितीत आणि कोणत्याही काळात सुसंघटित असणे आवश्यकच असते. केवळ सुसंघटित समाजच आपल्या सगळ्या समस्या यशस्वी रीतीने उलगडू शकतो हे आम्ही विसरता कामा नये.

१३४ चारित्र्य

                                                       १३४  चारित्र्य 

         जिस प्रकार हमारी प्रत्येक कृति में हमारा व्यक्तित्व अभिव्यक्त होता है, उसी प्रकार इन अनेक कृतियों को मिलाकर बना हुआ हमारा जीवन हमारा चरित्र प्रकट करता है | हम जो कुछ है अपने चिंतन के परिणाम है | अभियंता कहते हैं, कि जल अपने समतलतक पहुंचता है |जो बात जल की वही मनुष्य की | मनुष्य जहां भी रहेगा अपने स्तर के अनुरूप स्थान अर्जित कर लेगा | चरित्र के शील के शैल पर हम जितने उंचे चढेंगे, उतने उंचे किसी भी क्षेत्र मे चढेंगे, बिना रुके अबाध गती से | हमारा शील, हमारा चारित्र्य जितना उच्च, हमारा स्थान भी उतना ही श्रेष्ठ होगा, हमारा प्रभाव भी उतना ही अधिक होगा |                                                                 भगिनी निवेदिता


१३३ वीर

                                                                        १३३ वीर 

१  

         वीर कौन है ? वीर वह है - जो अपने धर्म को समझता है और चिरंतन सत् तत्व के ज्ञान का और अति समृद्ध विजयी ऐहिक जीवन का अर्थात् अभ्युदय  और नि:श्रेयस का - संयोग है | इस महान धर्म का साक्षात्कार केवळ उन्हीं को हो सकता है, जो सद्गुण-संपन्न और वीरमनस्क हैं,  उनको नही जो कायर हैं,  कमजोर हैं | यह महान सत्य दुर्बलों के लिए नही है | केवल वीर, सबल, साहसी और ऐसे लोग सफल हो सकते हैं, जो दुनिया में किसी भी बात का सामना बिना विचलित हुए पुरी शक्ती के साथ, तथा अपने मन का पूर्ण संतुलन रखते हुए कर सकते हैं |        प. पू. श्रीगुरुजी



१३२ समाजाचे संघटन

                                                            १३२  समाजाचे संघटन 

१  

         संघ ने समाज के अंदर एक पृथक् संघटन की बात कभी सोची ही नहीं, संघ ने अपने अस्तित्व में आने के समय से ही समाज के किसी एक वर्ग को अलग इकाई के रूप में संघटित करने का नहीं, अपितु संपूर्ण समाज को संस्कारीत करने का लक्ष्य स्पष्ट रूप से निर्धारित किया है | यही कारण है कि, संघ के कार्यकर्ता कभी भी लोगों के सामने अपने आपको ' संघी गुट ' के रूप में प्रस्तुत नहीं करते | यद्यपि उनमें से हजारों अकाल, बाढ पाकिस्तान से आये शरणार्थियों के प्रवाह इत्यादी राष्ट्रीय दुर्घटनाओं के समय अपने सर्वस्व का दांव लगाकर कार्य करते हैं | वे समाज के एक सामान्य नागरिक के रूप में रहना पसंद करते हैं और इस प्रकार वे उदाहरण प्रस्तुत करते हैं की सामान्य मनुष्य को एक संघटित, सजग सामाजिक जीवन में किस प्रकार व्यवहार करना चाहिए | इस प्रकार का सुगठीत, राष्ट्रप्रेमी और आत्मनिर्भर राष्ट्रजीवन ही अनंत और अपार शक्ती से अपने राष्ट्र को सुदृढ बना सकता है |            प.  पू. श्रीगुरुजी


शुक्रवार, २४ जानेवारी, २०२५

१३१ व्यवसायी मंडळी

                                                                              १३१  व्यवसायी मंडळी 

१  

           जेव्हा सामान्य जीवन व्यतीत करणारे, आपापले उद्योगव्यवसाय सांभाळणारे, नीटनेटका संसार करणारे लोक जेव्हा सर्व प्रकारे संघाचे काम करू लागतील तेव्हा संघाला समाजात मनाचे योग्य स्थान प्राप्त होईल. प्रचारकांच्या बाबतीत लोक बोलतात की, ' याला ना मुले बाळे, ना कामधंदा ! ' परंतु वकील, डॉक्टर अन्य व्यवसाय करणारी मंडळी संघचालक पदासारखी जबाबदारी अंगावर घेऊन ती यशस्वी करून दाखवतात तेव्हा त्याचा समाजावर मोठा परिणाम होतो. यासाठी लवकरात लवकर स्थानिक कार्यकर्ते उभे राहणे फार आवश्यक आहे.